در این بخش می توانید به شعرهای کاربردی بسیاری دست پیدا کنید و با استفاده از آن ها صحبت خود را تزیین کنید
شعرهای این بخش به صورت مداوم به روز رسانی خواهند شد

 

 

در ساغر تو چیست که با جُرعه نخست *** هُشیار و مست را همه مدهوش می کنی

هوشنگ ابتهاج

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به ناز و نعمت باغ بهشت هم ندهم *** کنار سفره ی نان و پنیر و چای تو را

هوشنگ ابتهاج

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متاع کفر و دین بی مشتری نیست *** گروهی آن، گروهی این پسندند

باباطاهر

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از اضطراب کار مهیا نمی شود *** سیل از دویدن است که دریا نمی شود

علیرضا تجلی

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گر مرد رهی غم مخور از دوری و دیری *** دانی که رسیدن هنر گام زمان است

هوشنگ ابتهاج

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این دُر همیشه در صدف روزگار نیست *** می گویمت، ولی تو کجا گوش می کنی

هوشنگ ابتهاج

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در ساغر تو چیست که با جُرعه نخست *** هُشیار و مست را همه مدهوش می کنی

هوشنگ ابتهاج

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هر چیز که دل به آن گراید *** گر جهد کنی به دستت آید

نظامی

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همت بلند دار که مردان روزگار *** از همت بلند به جایی رسیده اند

سعدی

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در گلو می شکند ناله ام از رِقّت دل *** قصه ها هست ولی طاقت ابرازم نیست

هوشنگ ابتهاج

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شب نگردد روشن از وصف چراغ *** نام فروردین نیارد گل به باغ

مولوی

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بر مال و جمال خویشتن غَرّه مشو *** کان را به شبی برند و این را به تبی

سعدی

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خاموشی لبم نه ز بی دردی و رضاست *** از چشم من ببین که چه غوغاست در دلم

هوشنگ ابتهاج

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گر به دولت برسی مست نگردی، مَردی *** گر به ذلت برسی پست نگردی، مَردی

گر هزاران دام باشد در قدم *** چون تو با مایی نباشد هیچ غم

مولوی

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مکن ز غصه شکایت که در طریق طلب *** به راحتی نرسید آنکه زحمتی نکشید

حافظ

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حافظ هر آنکه عشق نورزید و وصل خواست *** احرامِ طوافِ کعبه­ی دل بی وضو ببست

حافظ

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افتادگی آموز اگر طالب فیضی *** هرگز نخورد آب زمینی که بلند است

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دل چو خالی شود از عشق به دور اندازش *** شیشه بی باده چو گردید شکستن دارد

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این مرد را که باز در تلخی غم است *** مهمان به قند کن، چایت اگر دم است

علیرضا آذر

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خلق را تقلیدشان بر باد داد *** ای دو صد لعنت بر این تقلید باد

مولوی

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جدال با منت ای مدعی ز نادانی است *** که تیغ من همه فولاد و آن تو همه حَلَبی است

امیر نوری

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دود اگر بالا نشید کسر شأن شعله نیست *** جای چشم ابرو نگیرد گرچه او بالا تر است

شست و شاهد هردو دعوای بزرگی می کنند *** پس چرا انگشت کوچک لایق انگشتر است؟

آهن و فولاد از یک کوره می آیند برون *** آن یکی شمشیر گردد، دیگری نعل خر است

گر ببینی ناکسان بالا نشینند صبر کن *** روی دریا کف نشینند، قعر دریا گوهر است